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महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य की ‘आसुर व्यामोहन’ लीला

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Mahaprabhuji and Shrinathji
महाप्रभु  श्री वल्लभाचार्य ने ‘आसुर व्यामोहन’ लीला- वि.सं.1587 मि. आषाढ़ शु.2, रविवार को रथयात्रा उत्सव के दिन मध्यान्ह में हनुमान घाट काशी में सुर सरिता गंगाजी के प्रवाह में प्रवेश करके किया।
उस समय आपकी आयु 52 वर्ष रही। श्रीमहाप्रभुजी Shrimahaprabhuji ने लीला प्रवेश के पूर्व 40 दिन का व्रत तथा मौन धारण किया। आपने अन्तिम समय श्रीगोपीनाथप्रभुचरण एवं श्रीविट्ठलनाथप्रभुचरण को अन्तिम उपदेश रेती पर अंगुली से लिखकर जो दिया उसे शिक्षाश्लोकी कहते हैं। वे ‘सार्धत्रय’ अर्थात् साढ़े तीन श्लोक हैं –
यदा बहिर्मुखा यूयं भविष्यथ कथंचन।
तदा कालप्रवाहस्था देहचित्तादयोऽप्युत।।1।।
सर्वथा भक्षयिष्यन्ति युष्मानिति मतिर्मम।
न लौकिकः प्रभुः कृष्णो मनुते नैव लौकिकम् ।।2।।
भावस्तत्राप्य स्मदीयः सर्वस्वश्चैहिकश्च सः।
परलोकश्च तेनायं सर्वभावेन सर्वथा ।।3।।
सेव्यः स एव गोपीशो विधास्यत्यखिलं हि नः।।31/2।।
जिस समय श्री आचार्यचरण ने इन ‘साढ़े तीन’ श्लोक लिखकर कहे तब ही वहां पर साक्षात् भगवान् प्रकट हुए और श्री…..प्रभु ने डेढ़ श्लोक कहकर श्रीआचार्यजी द्वारा उपदिष्ट शिक्षा श्लोको को पूर्ण किया जो निम्नलिखित है –
मयि चेदस्ति विश्वासः श्रीगोपीजनवल्लभे ।।4।।
तदा कृतार्था यूयं हि शोचनीयं न कर्हिचित् ।
मुक्तिर्हित्वाऽन्यथा रूपं स्वरूपेण व्यवस्थिति।। 5।।
भावार्थ
‘यदि किसी भी प्रकार तुम भगवान से विमुख हो जाओगे तो काल-प्रवाह में स्थित देह तथा चित्त आदि तुन्हें पूरी तरह खा जायेंगे। यह मेरा दृढ़ मत है। भगवान श्रीकृष्ण को लौकिक मत मानना। भगवान को किसी लौकिक वस्तु की कोई आवश्यकता नहीं है। सब कुछ भगवान ही है। हमारा लोक और परलोक भी उन्हीं से है। मन में यह भाव बनाये रखना चाहिए। इस भाव को मन में स्थिर कर सर्वभाव से गोपीश्वर प्रभु श्रीकृष्णचन्द्र की सेवा करनी चाहिए। वे ही तुम्हारे लिए सब कुछ करेंगे।’
—विजयलक्ष्मी गोस्वामी के ह्वाट्सएप मेसेज से
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