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“माटी का लाल” श्री गोकुलानन्द जी तैलंग

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मेवाड़ की धरती के ग्राम नाथद्वारा, काँकरोली, बृजवासियों के लिये गोकुल, मथुरा और बृजभूमि की तरह है, बृज संस्कृति की
झलक पुष्टि मार्ग परम्परा और ठाकुर जी के मंदिर के साथ साथ यहाँ के ऐतिहसिक,प्राकृतिक एवं धार्मिक वातावरण ने अन्य प्रान्तो के आये लोगों को स्थायीवास करने हेतु प्रेरित किया है।
सन् 1935 का काँकरोली – राजसमन्द झील की उत्ताल तरंगो से खेलती अरावली से आकर झील की अनन्त गहराइयों में समा जाने को आकुल हवाओं की अठखेलियों को ब्रज -वृन्दावन से आए 24 वर्षीय कोमल कान्त काव्य मनीषा के प्रत्यूष से आलोकित युवक ने महसूस किया द्वारिकाधीश मंदिर के नगारखाने की शहनाइयों के बीच शयन के दर्शन का पवित्र
वातावरण ने गोकुलान्द तैलंग नामधारी इस युवक ने बस तय कर लिया वृन्दावन से प्रवास कर काँकरोली के धार्मिक – प्राकृतिक पर्यावरण के मध्य बसने का।
वृन्दावन के भागवत व्यासपीठ  से जुड़े भागवताचार्य पंडित मधुसूदन भट्ट के पुत्र के रूप में जन्मे गोकुलानन्द जी का बाल्यकाल संस्कृत व अन्यान्य भाषाओं के उन विद्वानों के सानिध्य में गुजरा जो माध्वग़ौडे़श्वर परम्पराओं सम्बद्ध थे! घर में मदन मोहन प्रभु की विस्तृत सेवा रही जिससे अपने पिता एक अग्रज और दो छोटे भाइयों के साथ आप सम्बद्ध रहे।
किन्तु बचपन से ही कुशाग्रबुद्धि होने से आधुनिक शिक्षा के प्रकाश सेे स्नात होने की आपकी ललक  सागर  “मध्य प्रदेश “जहां से हाईस्कूल की स्कूली शिक्षा लेने के बाद सन् 1934 में सागर विश्वविद्यालय से क्रमशः बी.ए.(आॅनर्स-अग्रेेजी व संस्कृत साहित्य ) एवं  एम. ए. (हिन्दी साहित्य ) सहित साहित्य रत्न की उपाधियां प्राप्त की ।
20 वीं शताब्दी के तृतीय दशक में उक्त उपाधियों के दम पर उच्च सरकारी नौकरियाँ  पाना अत्यंत सरल था। किन्तु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आन्दोलन में सरकारी नौकरियों के माध्यम से अंग्रेजियत की गुलामी न करने का जज़्बा इतना प्रबल था कि वि. वि. प्रवक्ता की नौकरी ठुकरा कर गोकुलानन्द जी ने तरूण युवक संगठन के माध्यम से महात्मा गांधी के नेतृत्व में तब संचालित हो रहे अाजादी के आन्दोलन में सहभागिता की ” विजय विश्वतिरंगा प्यारा झण्डा उँचा रहे हमारा ” के निनाद के साथ म्यूनिसिपल हाईस्कूल सागर में तिरंगा ध्वज फहराकर गिरफ्तारियाँ दी।
मन से साहित्यक संवेदनाओं से सम्पृत श्री तैलंग ने अपना पहला काव्य सृजन करते हुए “राष्ट्र भारती व मेरे गीत काव्य कृतियां लिखी जिन्हें मध्य प्रदेश के विद्वत पत्रकार मण्डल द्वारा तब पुरस्कृत किया गया था।
अपने युवा जीवन में यायावरी प्रकृति होने से सागर से ऊबकर पुनः वृन्दावन में आकर भागवत् एवं गौड़ीय परम्परा के जीव गोस्वामी व रूप गोस्वामी पर विमर्श लेखन किया। यही निवास करते हुए पुष्टि सम्प्रदाय के पंचम पीठाधीश्वर घनश्याम लाल जी महाराज के सम्पर्क में आने पर आपकी साहित्य ऊर्जा से प्रसन्न होकर महाराज श्री ने कामबन पीठ की साहित्यक परम्परा के संवर्द्धन का दायित्व आपको सोप दिया।
यह एक सहज संयोग ही रहा कि एक जातीय विवाह प्रस्ताव में श्री गोकुलानन्द जी का काँकरोली आगमन हुआ और स्वयं शु. तृतीय पीठाधीश्वर गोस्वामी ब्रजभूषण लाल जी महाराज ने अपने व लघु भ्राता गो. विट्ठल नाथ जी महाराज के परिवार के बालक -बालिकाओ के अध्ययन – अध्यापन के लिए आपको नियुक्त किया। साथ ही विद्या विभाग, के विविध साहित्य,पुष्टि सम्प्रदाय एवं आन्ध्रस्थ तैलंग परम्पराओं की शोध, समीक्षा, सर्वे एवं मौलिक लेखन का दायित्व सोपा।
वर्तमान महाराज श्री ब्रजेश कुमार जी सहित सभी गोस्वामी बालकों को विद्यालयी व महाविद्यालय शिक्षा के शिक्षण का गुरुतर भार वहन करते हुए तब से, मृत्यु पर्यन्त गोकुलानन्द जी ने काँकरोली के आचार्य परिवार के अभिन्न अगं रूप में काँकरोली और बड़ौदा प्रवास करते हुए शिक्षण एवं  महाराज श्री के सचिव रूप में कार्य करते हुए पुष्टिमार्गीय वाड्यमय व हिन्दी साहित्य के अनेक ग्रन्थो का प्रणयन किया।
अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि में ब्रजभूमि से जुड़े होने के कारण उन्होंने ब्रजभाषा में भक्ति भावना सहित अन्याय विविध सामाजिक -सांस्कृतिक विषयों पर काव्य, निबंध, हास्य, व्यंग्य श्रृंगार -भक्ति रस सहित समस्त रसों पर गद्य – पद्य दोनों ही विद्याओं पर कलम चलाई।
प्रमाण स्वरूप प्रेम गीत, रस निर्झर, गीत ग़ौरी,  राधागुणगान, रायसागर, गीत गोविन्द व भ्रमण गीत ग्रन्थों को रेखांकित किया जा सकता है।
श्री तैलंग खड़ी बोली हिन्दी के लेखन कार्य से भी सम्बद्ध रहे, और इस दिशा में हिन्दी ग़ज़लों के सुमधुर गीतकार कहे जा सकते है।
झरोखा, पलक, पलाश, बम्बई स्मृतियों के दंश, कांकरवल्लि, बैठक मंदिर के काव्यमय, संस्मरण इस दिशा में उनकी उल्लेखित रचनाएँ है । वल्लभाचार्य की वंश परम्परा सहित दक्षिण भारत के तैलंग वंश के, दक्षिण भारत से उत्तर भारत तक आगमन, पुष्टि सम्प्रदाय की स्थापना आदि विषयों पर गो.ब्रजभूषण लाल जी महाराज, और संस्कृत – वल्लव संप्रदाय के उद्भट विद्वान कण्ठमणि शास्त्री जी के शोधग्रन्थ विद्या विभाग, काँकरोली द्वारा प्रकाशित हुआ, वह पुष्टिमार्ग के प्रमाणिक साक्ष्य के रूप में आज भी प्रतिष्ठित है।
हवेली संगीत पर आधारित “संगीत अष्टछाप ” ग्रन्थ के जहाँ आप प्रणेता रहे वहीं हिन्दी साहित्य के आधिकारिक अष्टछाप साहित्य के आठ ग्रन्थों का प्रकाशन भी आपने ब्रजभूषण लाल जी के साथ किया।
सरल और शान्त स्वभाव के धनी गोकुलान्द की मित्रता  देश के ख्यातनाम साहित्य, कवियों से रही। आचार्य चतुर सेन, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामदरश मिश्र, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, काका हाथरसी, हनुमान प्रसाद पोद्दार, चिम्मन लाल गोस्वामी, एवं अनेक विश्वविद्यालय विद्वानों से पत्र व्यवहार और संवाद करते रहे।
राजसमन्द द्वारकेश राष्ट्रीय साहित्य परिषद् एवं नगर के साहित्यकारो से वे सदा भाव व सृजन के धरातल से जूड़े रहे,, परिषद की गोष्ठियाँ कभी मंदिर, काँकरोली -बड़ौदा, की विद्वत सभाओ सहित अपने घनिष्ठ मित्रों नारायण लाल जी, तहसीलदार राजकिशन जी मथुर, पी. पी. तैलंग, छन्नू लाल जी, धनीराम जी, आदि के साथ कभी इरिगेशन गार्डन, कभी ब्रजनिकुंज कभी बड़े बाग कभी विठ्ठल विलास बाग, के मध्य स्वान्त सुखाय, रचनाएं सुनने सुनाने का आनंद लेते रहे।
कल्याण संगीत, श्री कृष्ण संदेश, आदि पत्रिकाओं के आप स्थायी लेखक रहे है और बृजभाषा साहित्य सेवाओं के लिये राजस्थान बृजभाषा ऐकेडमी द्वारा भी सम्मानित हुए, ‘निकुंज” उपनाम आप अपने नाम के साथ लिखा करते थे।
आपकी धर्म पत्नी श्रीमति दुर्गा देवी  उस जमाने की पहली मैट्रिक पास नगर में विदुषी महिला थी ! उस जमाने में नगर पालिका बार्ड जो श्री भवानी शंकर जी दाधीच (चेयरमैन ) राजसमन्द के कार्य काल में पहली महिला पार्षद बनने का गौरव प्राप्त किया! उस जमाने में काँकरोली में ये शिक्षित परिवार था, आपने अपनी चारों पुत्रियों को उच्च शिक्षा प्रदान करवाई। उस समय काँकरोली ग्राम में दकियानूसी विचारधारा के चलते लड़कियों को स्कूल पढ़ाई करने नही भेजा जाता था! आपने शाक्षरता के केम्प मंदिर और खिड़क में चला। लड़कियों को पढ़ाने के लिये जनजागरण अभियान चलाया।
आपकी स्वाभाविक मृत्यु 16 अगस्त 1990 में काँकरोली में अपने निवास पर हुई। आप चार पुत्रियाँ, सुमन, मधुलिका, कौमुदनी, अर्चना, दो पुत्र डाँ राकेश तैलंग और श्री पद्ममेश तैलंग और पोते पोतियों पत्नी सहित पुरा परिवार छोड़ देवलोक गमन कर  गए।
समय की रेत पर श्री गोकुलानन्द जी तैलंग और उनके ही समान इस सांस्कृतिक शहर के अनेक साहित्यकारों, मनीषियों के पदचिन्ह हो सकता है अपने निशान धुमिल कर दें लेकिन मसिजीवी, लेखको, पत्रकारों, सुधी साहित्यकारजन, संस्कृतिविदों द्वारा जब उन्हें रेखांकित किया जाएगा तब तब उन दिवंगत आत्माओं के लिये ये पक्तियाँ अवश्य दोहराई जाएगी।
    दिल का सुना साज, तराना ढूँढेगा ।
    मुझको  मेरे  बाद, जमाना ढूँढेगा ।।
                                    प्रस्तुति
                              सूर्य प्रकाश दीक्षित
                            कवि एवं साहित्यकार
                        काव्य गोष्ठी मंच / काँकरोली
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